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अर्नव गोस्वामी से पहले जो पत्रकार गिरफ्तार हुए क्या वो प्रेस की आज़ादी पर हमला नही था?

कुछ पत्रकार तो अपने आप को सरकार व कानून से भी अपने आप को बड़ा समझते है और सरकार व कानून तक को चुनौती दे डालते है । लेकिन ऐसे पत्रकार अगर आज झूठ बोलना नही छोड़ा तो कल वह सच भी बोलेगे तो पाठक उनके लेखनी व चैनलों पर विश्वास नही करेंगे ।

असलम परवेज़, वरिष्ठ पत्रकार

रिपब्लिक टी वी के चीफ एडिटर अर्नव गोश्वामी की गिरफ्तारी को लेकर जिस तरह का भूचाल बड़े चैनल के पत्रकारों में आया है काश यह भूचाल गौरी लंकेश जैसे पत्रकारो के हत्या के बाद आया होता तो लगता कि सच मे प्रेस की आज़ादी खतरे में है । सरकार किसी की भी रही हो उन सरकारों ने अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ को डराने , खरीदने अथवा उसे मिटाने तक का काम किया , लेकिन बड़े बैनर के पत्रकार खामोश रहे । हा वे बोलते है लेकिन जब मामला किसी बड़े जाती के पत्रकार के साथ होता है तब बोलते है या फिर आरोपी मुस्लिम हो तब बोलते है वह भी अपनी चहेती सरकार , अधिकारी या पार्टी को खुश करने के लिए ।

तकलीफ तो जब होता है जब किसी पत्रकार के साथ कोई घटना हो जाती है तो वह जिस अखबार के लिए काम करता है वह अखबार उस पत्रकार को अपना पत्रकार तक नही लिखता है तब पत्रकार संघ उसकी लड़ाई लड़ता है । खास कर अगर दलित , पिछड़े या मुस्लिम पत्रकार के साथ कोई घटना हो जाती है तो बड़े पत्रकार एक दम चुप्पी साध लेते हैं । वैसे तो बहुत से पत्रकार संघ है लेकिन मिला जुलाकर सबका रवैया एक जैसा है यह संगठन बड़े पत्रकारो के पक्ष में खड़े तो होते है लेकिन जब इनकी बारी आती है तो जिले के पत्रकार अपने आप को डी एम ,एस पी और तहसील के पत्रकार अपने आप को सी ओ , एस डी एम से कम नही समझते ।

पत्रकारिता के क्षेत्र में छोटे अखबार व बड़े अखबार की बहुत बड़ी बीमारी है बड़े पत्रकारो द्वारा छोटे अखबार के पत्रकारो तरजीह न देने की वजह से ही आज पत्रकार दो फाड़ में बटते नजर आ रहे है ।
कुछ लालची पत्रकारो ने पत्रकारिता को पूरी तरह से बदनाम कर दिया है यही वजह है कि सोशल मीडिया पर आम जनता पत्रकारो को किस नाम से सम्बोधित कर रही हैं ? जो शर्म की बात है ।

कुछ पत्रकार तो अपने आप को सरकार व कानून से भी अपने आप को बड़ा समझते है और सरकार व कानून तक को चुनौती दे डालते है । लेकिन ऐसे पत्रकार अगर आज उन लोगो ने झूठ बोलना नही छोड़ा तो कल वह सच भी बोलेगे तो पाठक उनके लेखनी व चैनलों पर विश्वास नही करेंगे । आज के दौर के पत्रकार अपने शीर्षक से सिर्फ सनसनी फैलाना जानते है जब कि वास्तविकता यह है उनके द्वारा लिखे गए शीर्षक व सूचनाओ का कोई तालमेल नही होता । उनके दिए गए शीर्षक के मुताबिक समाचारों में सूचनाएं गायब रहती है । अब भी वक़्त है वे लोग अपनी आदत में सुधार लाये और आम जनता की उम्मीदों पर खरा उतरे ।

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