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20 वर्षो बाद हुए बाइज्जत बरी , यह बदले की करवाई नही तो और क्या है?

सूरत की एक अदालत माना कि गिरफ्तार 127 लोग सिमी के सदस्य नही. ऐसा तब तक होता रहेगा जब तक मुसलमान सिर्फ भाजपा को हराने के लिए फर्जी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को वोट देते रहेंगे.

असलम परवेज़, वरिष्ठ पत्रकार

गुजरात पुलिस ने सिमी का सदस्य होने के सन्देह होने व उसके मीटिंग में शामिल होने के आरोप में 127 लोगो को गिरफ्तार किया था लेकिन 20 वर्षों बाद सूरत की कोर्ट ने उन्हें सबूतों के अभाव में बाइज्जत बरी कर दिया । उनमे से 5 लोगों की मौत भी हो चुकी थी।

सवाल यह उठता है कि जिन 20 वर्षों में उन लोगों ने यातनायें झेली और इस दौरान उनकी जन्दगी व जवानी दोनों बर्बाद हो गई । भाजपा को छोड़ सभी धर्मनिरपेक्ष दलों को मुसलमानों का वोट चाहिए लेकिन मुसलमानो के बुनियादी मसले पर काम करना तो दूर की बात है , ये तो बोलने से भी कतराते है । हिंदुस्तान में कयादत वाली पार्टियों को छोड़ जितनी पार्टियों है जब भी उनकी सरकार बनी सबसे पहले उन लोगो ने अपने बिरादरी के भला किया।


मुसलमानो के हालात तो ऐसे है कि उनको फर्जी मुकदमो में फंसा कर उनकी जन्दगी खराब कर दी जयेगी । जो ऐसा करते है उन्हें मालूम है कि इनके लिए कोई आवाज़ उठाने वाला नही है । ऐसा तब तक होता रहेगा जब तक मुसलमान सिर्फ भाजपा को हराने के लिए फर्जी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को वोट देते रहेंगे ।

कथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को मालूम है कि जिस तरह दलित व पिछड़े वर्ग के कुछ लोग प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन सिर्फ इस लिए करते है कि उनकी सियासी बुजियाद सिर्फ मुस्लिम विरोध पर ही टिकी है और उन्होंने गुजरात मे मुख्यमंत्री रहते हुए 2002 के दंगे में 2000 से ज्यादे मुसलमानो का कत्ल करवाया था ।

उसके बाद केंद्र में 2004 से लेकर 2014 तक केंद्र में कांग्रेस की सरकर रही परन्तु उसने गुजरात के मुसलमानों को इंसाफ दिलवामे के बजाय मोदी व संघ के लोगों को बचाने का काम किया ।

लेकिन कांग्रेस को पता नही था कि वह जिस संघ रूपी अजगर को दूध पिला रही है वह उसी को निगल जयेगा । आज अगर कांग्रेस संघ के वजह से ही सत्ता से बाहर है लेकिन कोई बड़ा कांग्रेसी नेता संघ के खिलाफ कभी नही बोलेगा , क्योंकि संघ के सदस्य (विचारक ) कांग्रेस समेत सभी तथा कथित सेक्युलर पार्टियों में मौजूद है।

गिरफ्तारियां तो फर्जी तरीके सभी सरकारों ने किया वह चाहे भाजपा की सरकार हो या कांग्रेस समेत कथित सेक्युलर दलों की । अब अगर मुसलमान न होश में आया तो अपने ही मुल्क में गुलामो से भी बदतर जिंदगी जियेगा । कहने का मतलब यह है कि मुसलमान अब किसी को भी सियासी समर्थन करे लेकिन अपने शर्तों के साथ , समर्थन मागने वाले के सामने मुसलमान अपने लिए रोजगार , तालीम व तरक्की की शर्त रखे । जिसको ये शर्ते मंजूर न हो उसे मुस्लिम समाज हरगिज वोट न करे ।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट एएन दवे की अदालत ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया. मामले की सुनवाई के दौरान पांच आरोपियों की मौत हो गई थी.

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन यह साबित करने के लिए ‘ठोस, विश्वसनीय और संतोषजनक’ साक्ष्य पेश करने में नाकाम रहा कि आरोपी सिमी से जुड़े हुए थे और प्रतिबंधित संगठन की गतिविधियों को बढ़ाने के लिए एकत्र हुए थे.

अदालत ने कहा कि आरोपियों को यूएपीए के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

इस मामले के आरोपी गुजरात के विभिन्न भागों के अलावा तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और बिहार के रहने वाले हैं.

अपने बचाव में आरोपियों ने कहा कि उनका सिमी से कोई संबंध नहीं है और वे सभी अखिल भारतीय अल्पसंख्यक शिक्षा बोर्ड के बैनर तले हुए कार्यक्रम में शामिल हुए थे.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक कोर्ट ने कहा, ‘न्यायालय ने पाया है कि आरोपी एक शैक्षणिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जुटे थे और उनके पास कोई हथियार नहीं था. अभियोजन इस बात को साबित नहीं कर पाया है कि आरोपी सिमी से जुड़ी किसी गतिविधि के लिए जुटे थे.’

उन्होंने आगे कहा, ‘यहां तक कि छापेमारी के दौरान भी 123 में से एक भी व्यक्ति ने भागने की कोशिश नहीं की. जब्त की गई सामग्री का भी सिमी से कोई संबंध नहीं है.’

पुलिस ने उन्हें इस आधार पर सिमी से जोड़ने की कोशिश की थी कि हॉल को एआर कुरैशी और सिमी के राष्ट्रीय सदस्य साजिद मंसूरी के भाई अलिफ माजिद मंसूरी ने बुक किया था. पुलिस ने आरोप लगाया था कि सिमी के कार्यों को पूरा करने के लिए शैक्षिक संगोष्ठी सिर्फ एक दिखावा था.

इस मामले को लेकर बीते शनिवार को हुई सुनवाई के दौरान 111 आरोपी कोर्ट में मौजूद थे. मौलाना अतउर रहमान वाजदी, जो अब 85 साल के हैं, ने कहा गिरफ्तारी के बाद हर किसी ने उनसे मुंह मोड़ लिया था.

वाजदी ने कहा, ‘किसी ने भी हमसे बात नहीं की और न ही सुना. इतने सालों से मैं देशविरोधी के धब्बे के साथ जी रहा था. अब कम से कम आजाद होकर मरेंगे.’

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